कर्नाटक का युद्ध | यूरोपीय कंपनी का भारत में आगमन

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फ़्रांसिसी, डेनिश तथा स्डीविस का भारत में आगमन

पुर्तगाली, डच तथा ब्रिटिश कंपनी के आगमन के बाद भारत में डेनिश, फ़्रांसिसी तथा स्वीडिश कंपनियों का भारत में आगमन होता हैं। अगर हम परीक्षा की दृष्टी से देखे तो तो फ़्रांसिसी कंपनी के बारे में पढ़ना सबसे महत्वपूर्ण है। इसलिए इस पोस्ट में मुख्य रूप से हमलोग फ़्रांसिसी कंपनियों के बारे में पढ़ेंगे साथ ही साथ डेनिश तथा स्वीडिश कम्पनियोब के बारे में संक्षेप में पढ़ेंगे।

डेनिश कंपनी का भारत में आगमन

डेनमार्क के कंपनियों को डेनिश कंपनी के नाम से जाना जाता हैं। डेनिश कंपनी का भारत में आगमन 1616 इस्वी को हुआ था। और इन्होने अपना सबसे पहला कंपनी तमिलनाडु के तंजौर में स्थापित किया। फिर यहाँ से इन्होने भारत में व्यापार करना शुरू किया।

फ़्रांसिसी कंपनी का भारत में आगमन

फ़्रांस में भी राजशाही राजनीती व्यवस्था था और उस समय वहाँ के रजा थे लुई 16 वाँ थें। इन्ही के शाषण काल में पहली बार 1664 इस्वी में फ़्रांसिसी ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना भारत में होती है।

आइये देखते है भारत में कुछ फ़्रांसिसी कंपनियों के स्थापना का शाषण काल

  • 1664 इस्वी में भारत में पहली बार फ़्रांसिसी कंपनी की स्थापना होती है।
  • इसके बाद 1668 इस्वी में भारत में पहली बार फ़्रांसिसी कंपनी की स्थापना होती है।
  • इसके बाद मसुलिपत्तम में 1669 इस्वी में दूसरी कंपनी की स्थापना होती है।
  • तीसरी कंपनी की स्थापना 1673 इस्वी में भारत के पान्डूचेरी में स्थापित होती है। इसके बाद भारत के पान्डूचेरी में फ्रांसीसियों का शाषण हो जाता हैं। और यह बर्चस्व भारत के आजादी के बाद 1954 इस्वी में ख़त्म होता है।
  • इसी क साथ साथ 1674 इस्वी में चंद्रनगर, माही तथा करिथल में फ्रंसिसी कंपनी की स्थापना हो जाती है।

इन कंपनियों की स्थापना के साथ साथ फ्रांसीसियों का भारत में बर्चस्व काफी मजबूत हो जाता हैं। एक तरफ से जहां फ़्रांसिसी कंपनी की प्रभुता स्थापित हो रही थी उसी समय दूसरी ओर अंग्रेजी कम्पनियाँ भी भारत में अपना पाँव पसार रही थीं। इसी क्रम में इनदोनों कंपनियों में एक दुसरे से आगे बढ़ने में होड़ लगी थी। इसीलिए इन दोनों कंपनियों में हमेशा टकराव होते रहते थे। इसीक्रम में इन दोनों कंपनियों के बिच बहुत सारी लड़ाईयां होती है। आइये इन सभी लड़ाईयों को विस्तार से पढ़ते है।

भारत में अपनी प्रभुता को बनाये रखने के लिए फ़्रांसिसी तथा अंग्रेजो के बिच जो लड़ाई होती है, जिसे कर्नाटक के लड़ाई के नाम से जाना जाता है। यह कर्नाटक की लड़ाई भारत में तीन चरणों में लड़ा गया था।

प्रथम कर्नाटक का युद्ध :-

कर्नाटक का युद्ध | यूरोपीय कंपनी का भारत में आगमन

कर्नाटक का युद्ध | यूरोपीय कंपनी का भारत में आगमन

प्रथम कर्नाटक का युद्ध सन 1746 इस्वी में शुरू हुआ तथा 1748 इस्वी चला था। इस लड़ाई को 2 सालों तक लड़ा गया था।

कारण :-

प्रथम कर्नाटक युद्ध का मुख्य कारण यूरोप में स्थित ऑस्ट्रिया पर अधिकार पाना था। ऑस्ट्रिया पर अधिकार जमाने के लिए फ़्रांस तथा ब्रिटेन बिच लड़ाई हो जाती है। यह लड़ाई यूरोप में होती है लेकिन इस इस लड़ाई का प्रभाव भारत में स्थित फ़्रांसिसी तथा अंग्रेजी कंपनियों के बिच देखने को मिलता है। फलस्वरूप ये दोनों कम्पनियाँ ऑस्ट्रिया के मुदे को भारत में भी लड़ने लगती है।

संधि :-

प्रथम कर्नाटक युद्ध को समाप्त करने के लिए ब्रिटेन तथा फ़्रांस के बिच ए ला शापल की संधि होती हैं और इस युद्ध का अंत हो जाता हैं। यह संधि 1748 इस्वी में यूरोप में होती हैं। जिसका परिणाम यह होता हैं की ऑस्ट्रिया के मुदे को लेकर युरोप में  फ़्रांस तथा ब्रिटेन के बिच मध्यस्ता हो जाता है और यही कारण है की भारत में भी कंपनियों के बिच मतभेद ख़त्म हो जाता हैं।

विशेषतायें :-

इस लड़ाई के दौरान भारतीय फ़्रांसिसी गवर्नर डुप्ले ने मॉरिशस फ्रेंच गवर्नर लॉ बू डाँने को भारत में बुलाता है और ब्रिटेन पर दबाव डालकर उससे मद्रास को छीन लेता है। और इसको अंजाम देने के लिए 1746 इस्वी में एक लड़ाई लड़ी जाती हैं जिसे सेंट थौम के लड़ाई के नाम से जाना जाता हैं। इस लड़ाई का कोई खास परिणाम नही निकलता हैं जिस मद्रास को फ़्रांसिसीयों ने छीना था वह फिर से ब्रिटेन के कब्जे में हो जाता हैं। और अमेरिका क्षेत्र में कुछ भागों में ब्रिटेन का कब्ज़ा हो गया था जिसे ख़त्म करके फिर से उस क्षेत्र को फ़्रांस के हवाले कर दिया जाता हैं।

द्वितीय कर्नाटक का युद्ध :-

द्वितीय कर्नाटक का युद्ध सन 1749 इस्वी में शुरू हुआ तथा 1754 इस्वी चला था। इस लड़ाई को 5 सालों तक लड़ा गया था।

कारण :-

द्वितीय कर्नाटक युद्ध का मुख्य कारण हैदराबाद तथा कर्नाटक में उतराधिकार को स्थापित करना था। सन 1749 इस्वी में कर्नाटक तथा हैदराबाद में उतराधिकार की समस्या उत्पन हो जाती हैं। इसमें एक पक्ष को फ़्रांस द्वारा मदद किया जा रहा था इसी के साथ दुसरे पक्ष को अंग्रेज द्वारा मदद किया जा रहा था। ऐसे स्तिथी में इन दोनों के बिच मतभेद होना लाजमी था। इसीलिए इन दोनों के बिच संघर्स शुरू हो जाता हैं।

संधि :-

द्वितीय कर्नाटक युद्ध को समाप्त करने के लिए पांडिचेरी में ब्रिटेन तथा फ़्रांस के बिच एक संधि होती हैं जिसे पांडिचेरी के संधि के नाम से जाना जाता हैं । इसके परिणाम स्वरूप इस युद्ध का अंत हो जाता हैं। यह संधि 1755 इस्वी में भारत में होती हैं क्युकी यह भारत के कर्नाटक तथा हैदराबाद के विवाद पर लड़ा गया था।

विशेषतायें :-

इस लड़ाई के दौरान अंग्रेज चाहता था की मेरे नेतृत्वकर्ता हैदराबाद तथा कर्नाटक का शासक बने इसके साथ ही फ़्रांस चाहता था की मेरे नेतृत्वकर्ता हैदराबाद तथा कर्नाटक का शासक बने। इसी कारण को लेकर दोनों के बिच युद्ध होता है जिसे अम्बुर के युद्ध के नाम से जाना जाता हैं।

तृतीय कर्नाटक का युद्ध :-

तृतीय कर्नाटक का युद्ध सन 1756 इस्वी में शुरू हुआ तथा 1763 इस्वी चला था। इस लड़ाई को 7 सालों तक लड़ा गया था।

कारण :-

यूरोप में फ़्रांस तथा ब्रिटेन के बिच 7 वर्षो के लिए युद्ध की स्तिथि बनती हैं। चुकी यह 7 वर्षो के लिए था इसीलिए इसे सप्तवर्शीय युद्ध के नाम से जाना जाता हैं। मुख्य रूप से यह युद्ध यूरोप में लड़ा गया था लेकिन उस समय भारत में भी फ़्रांस तथा ब्रिटेन का ही बर्चस्व था इसीलिए यहाँ भी इन दोनों के बिच मतभेद चालू हो जाता हैं।

संधि :-

तृतीय कर्नाटक युद्ध को समाप्त करने के लिए 1763 इस्वी यूरोप के पेरिस में ब्रिटेन तथा फ़्रांस के बिच एक संधि होती हैं जिसे पेरिस के संधि के नाम से जाना जाता हैं । इसके परिणाम स्वरूप इस युद्ध का अंत हो जाता हैं।

विशेषतायें :-

तृतीय कर्नाटक युद्ध जो सप्तवर्शीय मुदे पर लड़ा जा रहा था इसी युद्ध के दौरान 1760 इस्वी में फ़्रांस तथा अंग्रेजों के बिच एक युद्ध लड़ा जाता है जिसे वांडीवास के युद्ध के नाम से भी जाना गया इस युद्ध में फ़्रांस तथा अंग्रेज सीधे आमने सामने टकराते हैं। चुकी यह किसी मुदे पर आधारित युद्ध नहीं था ये दोनों आपस में टकराते हैं जिसमे फ़्रांस बुरी तरह पराजित हो जाता हैं और वह भारत से चला जाता हैं। इस युद्ध के दौरान अंग्रेजों के नेतृत्वकर्ता आयरकूट तथा फ़्रांस के नेतृत्वकर्ता काउण्ट लालि था।

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