भारत में अंग्रेजो का आगमन | यूरोपियन कंपनियों का भारत में आगमन

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भारत में अंग्रेजो का आगमन

चुकी हम जानते है की भारत में अंग्रेजों तथा फ़्रांसिसी के आगमन के पहले पुर्तगाली तथा डच का आगम हो चूका था।

भारत में अंग्रेजो का आगमन | यूरोपियन कंपनियों का भारत में आगमन

भारत में अंग्रेजो का आगमन | यूरोपियन कंपनियों का भारत में आगमन

भारत में अंग्रेजों का आगमन

31 दिसम्बर 1600 इस्वी को अंग्रेजों की महारानी एलिजाबेथ प्रथम द्वारा एक कंपनी स्थापित की जाती है। इस कम्पनी का मूल उदेश्य पूर्वी देशो या भारत में जाकर जाकर व्यापार करना था। हालाकि अभी इस कंपनी का नाम ईस्ट इंडिया कंपनी नहीं था। कंपनी का नाम 1831 इस्वी के एक्ट के तहत ईस्ट इंडिया कंपनी रखा गया था। इस कंपनी को भारत के क्षेत्र में आकर व्यापार करने का आदेश 1600 इस्वी को पास हुआ। और फरमान को, अंग्रेजों के उस समय के वर्तमान रानी एलिजाबेथ प्रथम द्वारा जारी की गई थी।

सन 1600 इस्वी में भारत की स्तिथि

सन 1600 इस्वी में भारत में मुग़ल वंश का शासन था। और उस समय सता पर काबिज थे अकबर महान।

ब्रिटिश का भारत में आगमन

लेकिन जब ये ब्रिटिश कंपनी भारत आना शुरू होती है तो धीरे धीरे इसका आकार बदल जाता है। प्रारंभ में जब यह कंपनी स्थापित हुई तो उस समय उसे 15 वर्षों तक व्यापार करने की फरमान जारी की गयी। लेकिन धीरे धीरे कंपनी की अवधि को बढाया जाता रहा और व्यापार काल बढ़ता रहा। सन 1603 इस्वी में एलिजाबेथ प्रथम की मौत हो जाती है। एलिजाबेथ के मौत के बाद ब्रिटेन का शासक जेम्स प्रथम को बनाया जाता है। और पूरी कंपनी की जिम्मेदारी जेम्स प्रथम को सौप दिया जाता है। इस कंपनी को फिर से संचालित करने के लिए जेम्स प्रथम ने भारत में एक राजदूत भेजता है। इस राजदूत का नाम कैप्टन हॉकिन्स था। कैप्टन हॉकिन्स 1608 इस्वी में जेम्स प्रथम का फरमान लेकर अकबर के दरबार में पहुंचे। चुकी जेम्स प्रथम को लग रहा था कि अभी भी अकबर ही भारत का शासक है। इसलिए उसने अपना पत्र अकबर के नाम से भेजा था। लेकिन हमलोगों को पता है कि सन् 1605 इस्वी में अकबर का निधन हो जाता है। और भारत कि गदी पर जहांगीर का शासन होता है। इसलिए कैप्टन हॉकिन्स जहांगीर के दरबार में पहुंच जाते हैं। इसके बाद जहांगीर ने 1608 इस्वी में सूरत में कंपनी बनाने का आदेश से देता हैं। इसके बाद 1608 में सूरत में कंपनी बनना शुरू हो जाता है। लेकिन इस कंपनी के पूरा होने से पहले ही 1611 इस्वी में मसुलीपत्तम में अंग्रेजों ने अपनी पहली फैक्ट्री स्थापित कर लेता है। इसके बाद 1613 इस्वी में जो सूरत वाली कंपनी था वो बनकर तैयार हो जाता हैं। इसी के साथ साथ सर टॉमस रो ने 1615 में कंपनी से संबंधित ही फरमान लेकर जहांगीर के दरबार में पहुंचता हैं। दूत का मतलब ऐसे व्यक्ति को एक देश से दुसरे देश में व्यापारिक संबंधों तथा समन्वय लेकर जाते है इस प्रकार के लोगो को दूत कहा जाता हैं।

ब्रिटिशों का भारत में पकड़

सन् 1632 में दक्षिण भारत के एक राज्य गोलकुंडा द्वारा एक सुनहरा फरमान जारी किया जाता हैं। इस फरमान के द्वारा अंग्रेजो को भारत में फ़्री में व्यापार करने की अनुमति मिल जाती हैं। यह भारत में पहली बार हुआ था कि किसी यूरोपीय कंपनी को फ़्री व्यापार का अवसर प्राप्त होता है। इसके साथ साथ सबसे बड़ी उपल्धि तब होता हैं जब फर्रूखशियर द्वारा एक फरमान जारी किया जाता हैं। सन् 1717 इस्वी में जॉन सरमन नामक एक ब्रिटिश दूत भारत पहुंचता है। इस समय भारत में मुगलों के कमजोर कड़ी की शुरुआत हो चुकी थी। इसे उत्तर मुगल काल के नाम से भी जाना जाता है। और उस समय भारत के शासक थे फर्रूखशियर। जॉन सरमन अपनी समस्या लेकर फर्रूखशियर के दरबार में पहुंचता हैं। इसके बाद फर्रूखशियर द्वारा एक फरमान जारी किया जाता है जिसके तहत 3000 रुपए वार्षिक कर लेकर बंगाल तथा 10000 रुपए वार्षिक कर लेकर सूरत में व्यापार करने की खुली छूट से देता हैं। साथ ही साथ अंगेजों द्वारा को सिक्के बंबई में चलाए जाते थे उस पूरे भारत में चलाने कि आदेश दे देता हैं। इसी फरमान को ब्रिटेन में मैग्नाकाटा के नाम से जाना जाता था।

सन् 1661इस्वी की घटना

सन् 1661 इस्वी में ब्रिटेन के राजकुमार चार्ल्स दूतिय का पुर्तगाल के राजकुमारी कैथरीन के साथ विवाह हो जाता है। जिसके परिणाम स्वरूप पुर्तगाली बंबई को दहेज स्वरूप ब्रिटेन को सौंप देता हैं। इसके बाद होता ये है कि की 1668 इस्वी में 10 पौंड वार्षिक कर लेकर बंबई को ब्रिटेन कम्पनियों को सौंप दिया जाता हैं। और उसे वहाँ व्यापार करने की खुली छुट दे दी। इसके साथ ही धीरे – धीरे करके ब्रिटेन की स्तिथि भारत में मजबूत होती जा रही थी।

मुगलों तथा अंग्रेजों के बिच तकरार

हमलोगों ने देखा की अकबर के समय क्या स्तिथि थी, जहाँगीर के समय क्या स्तिथि थी तथा फरुख्शियर के समय क्या स्तिथि थी। ल्र्किन इसके बाद एक और मुग़ल शासक आता है जिसका नाम औरंगजेब था। औरंगजेब के समय अंग्रेजों के बिच थोड़ी सी खटास आ जाती है। होता ये है कि की औरंगजेब के समय अंग्रेज हुगली नदी के किनारे अपना पाँव पसार रहे थे। इसके साथ ही मुंबई के समुंद्री क्षेत्रों में मुगलों के जहाजों पर अपना नियंत्रण स्थापित करने लगे थे। इन्ही सभी कारणों से औरंगजेब काफी दुखी था। और उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध करने का निर्णय लिया। इसके बाद औरंगजेब ने अंग्रेजों को हुगली नदी के क्षेत्र के खदेड़ कर बाहर कर देता है। लेकिन अफसोश की बात यह होती है की अंग्रेज ज्यादा दिन बहार रह नहीं पाते है। और सन 1688 इस्वी में औरंगजेब का सामना सर जॉन चाइल्ड से हो जाती है। और इस युद्ध में औरंगजेब ने सर जॉन चाइल्ड को बुरी तरह पछाड़ देता है। लेकिन इन दोनों के बिच एक संधि होती है जिसके तहत सर जॉन चाइल्ड को फिर से भारत में रुकने की मंजूरी प्राप्त हो जाती है। और इसके बदलें ही सर जॉन चाइल्ड को काफी जुर्माना भी चुकाना पड़ता है।

अंग्रेजों का विस्तार

अगर हम दक्षिण भारत की बात करें तो तो मद्रास के क्षेत्र, कोलकाता क्षेत्र तथा मुंबई के क्षेत्र जो उनको दहेज के रूप में मिला था इन सभी इलाको में अंग्रेजों का बर्चस्व काफी मजबूत हो चूका था। और बाद में इन तीनों क्षेत्रों को अंग्रेजों ने अपने प्रेसीडेंसी के रूप में स्थापित कर लिया।

अंग्रेजों द्वारा स्थापित प्रेसीडेंसी

मद्रास प्रेसीडेंसी :- मद्रास प्रेसीडेंसी जिसे मद्रास प्रांत के रूप में भी जाना जाता है। ब्रिटिश भारत का एक प्रशासनिक प्रेसीडेंसी था। मद्रास शहर प्रेसीडेंसी की शीतकालीन राजधानी तथा ग्रीष्मकालीन राजधानी थी। सीलोन द्वीप 1793 से 1798 तक मद्रास प्रेसीडेंसी का एक हिस्सा था जब इसे क्राउन कॉलोनी बनाया गया था। मद्रास प्रेसीडेंसी उत्तर पश्चिम में मैसूर के राज्य, दक्षिण पश्चिम में कोच्चि के राज्य और उत्तर में हैदराबाद के राज्य द्वारा पड़ोसी था। यहाँ के फोर्ट सेंट जॉर्ज नामक किला अंग्रेजों द्वारा बनाया गया था। मद्रास प्रेसीडेंसी का नेतृत्वकर्ता आयर को दिया गया।

बॉम्बे प्रेसीडेंसी :- बॉम्बे प्रेसीडेंसी को 1843 से 1936 तक बॉम्बे और सिंध के नाम से भी जाना जाता है।

बंगाल प्रेसीडेंसी :-बंगाल प्रेसीडेंसी को आधिकारिक तौर पर फोर्ट विलियम का प्रेसीडेंसी और बाद में बंगाल प्रेसीडेंसी के नाम से भी जाना जाता था। अंग्रेजों ने बंगाल  प्रेसीडेंसी की राजधानी कलकाता बनाया क्युकी बंगाल कलकाता के आस पास पड़ता था। कई वर्षों के लिए, बंगाल के राज्यपाल समवर्ती रूप से भारत के वायसराय थे और 20 वीं शताब्दी की शुरुआत तक कलकत्ता भारत की वास्तविक राजधानी थी।

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