भारत में डच का आगमन | यूरोपियन कंपनियों का आगमन

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भारत में डच का आगमन | यूरोपियन कंपनियों का आगमन

भारत में डच का आगमन

पुर्तगालियों के आगमन बाद भारत में कार्नेलियस हाउट मैन के नेतृत्व में सन 1595-1596 इस्वी के बिच यूरोपीय व्यापारी डच का आगमन होता है। डच यूरोप से सीधे निकलकर सीधे पूर्वी एशिया पहुचता है। उसके बाद वो व्यापार के लिए सबसे पहले इंडोनेशिया पहुच जाता है। और वहाँ पर वे लोग मशालों की व्यापार करते है। मशालों का व्यापार करने का कारण यह भी होता है की यूरोपीय क्षेत्रों में जाड़ो के दिनों में बर्फ के कारण वहाँ मशालों की खेती है। इसीलिए डच इंडोनेशिया से कम दामों में मशाला यूरोप ले जाते थे और फिर वहाँ पर बेच देतें थे जिससें उनको काफी मुनाफा होता था। इंडोनेशिया से वेलोग ब्लैक पेपर, अदरक, गरम मशालें आदि ले जाते थे। और वहाँ के लोग इन मशालों को चिकन के साथ मिलाकर काफी चाव से खाते थे।

भारत में डच का आगमन | यूरोपियन कंपनियों का आगमन

भारत में डच का आगमन | यूरोपियन कंपनियों का आगमन

इसके बाद धीरे धीरे 1595 इस्वी में डच भारत बहुच जाते है और यहाँ पर भी अपना व्यापार चालु कर देते है।

डच इस्ट इंडिया कंपनी (1602)
डच ने पहली बार 1602 में अपनी पहली कम्पनी स्थापित की।

कम्पनियों द्वारा कोठी की स्थापना

चुकी व्यापार को बड़े स्थानों से लेकर छोटे स्थानों तक भी फैलाना था। इसीलिए सभी कम्पनियों ने अपनी अपनी कोठी स्थापित की।

सबसे पहले पुर्तगालियों ने 1503 ईसवी में अपनी पहली कोठी कोचीन में स्थापित की। इसके बाद डच ने 1605 ईसवी पसुलीपत्तम में अपनी पहले कोठी स्थापित की। 1608 ईसवी में पहली बार अंग्रेजो ने सूरत में अपनी पहली कोठी बनाई। और इसके बाद फ्रांसीसी ने 1664 ईसवी में सूरत में अपनी पहली कोठी बनाई।

डच भारत से वे मशाले, सूती कपडे, तथा अन्य कपडे का भी व्यापार करते थे। लेकिन जिसप्रकार पुर्तगालियों ने अपने देश में भारत के मशालों की प्रशंसा की उसी तरह डच ने भारत के सूती कपडे की प्रशंसा की। इसका कारण यह भी था की डच को मशालें तो इंडोनेशिया क्षेत्र से मिल जाता था लेकिन कपड़ो के लिए उसे भारत ही आना पड़ता है। भारतीय कपड़े काफी मुलायम तथा हल्का होने के साथ काफी सस्ता भी होता था। इसीलिए डच इन कपड़ो को अपने यहाँ के बाजार में काफी महंगा बेचते थे। जिससे उनको काफी मुनाफा होता था। जिसके कारण वे व्यापारी भारतीय शासकों को काफी कर भी देता था। इसलिए शुरुआत में भारतीय शासकों ने यूरोपीय व्यापारियों को काफी मदद किया। साथ ही साथ उन्हें कम्पनी स्थापित करने में भी काफी मदद की लेकिन जब भारतीय शासकों को यह पता चला की ये यूरोपीय व्यापारी का मकशद केवल व्यापार करना ही नही राजनितिक हस्तक्षेप करना भी है। इसिलिये भारतीय शासको ने बाद में सभी यूरोपीय कम्पनियों का विरोध करना चालू कर दिया।

वेदरा का युद्ध (1759)

वेदरा बंगाल की एक जगह है। यहाँ पर सन 1759 इस्वी में डच और ब्रिटेन के बिच व्यापार से ही लेकर एक संघर्ष हुआ। जिसमे डच बुरी तरह पराजीत हो गया। इससे यह पता लग गया की डच भारत में ज्यादा दिन तक नहीं टिक सकते। और इसके बाद लगभग डचों का शाषण समाप्त हो गया। इसके साथ ही अंग्रेज आगे बढ़ते चले गये।

 

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