यूरोपीय कंपनियों का आगमन | पुर्तगालियों का भारत में आगमन

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यूरोपीय कंपनियों का आगमन | पुर्तगालियों का भारत में आगमन

यूरोपीय कंपनियों का आगमन से पहले भारत और यूरोप का स्तिथि

उस समय भारत में मध्यकालीन भारत का दौर चल रहा था तथा यूरोप में आधुनिक यूरोप का दौर चल रहा था। इस समय भारत में मुगलों का शाषण था। और यूरोप में पुनर्जागरण अपने विस्तृत रूप को पार कर चूका था। तथा भौगोलिक खोजों की होड़ सी लग गयी थी। तथा इस समय भारत की स्तिथि व्यापार करने के काफी अनुकूल हो चूका था। इसी का फायदा उठाकर यूरोपीय कंपनियों व्यापार करने के लिए भारत आता है। ऐसी बात नहीं है की भारत का व्यापार पहली बार यूरोप से हो रहा था, सिन्धु घाटी सभ्यता एवं प्राचीन काल से ही भारत और यूरोप के बिच व्यापार स्थलीय मार्गो होता रहा है। लेकिन एक ऐसी स्तिथि पैदा होती है की स्थल मार्ग बंद हो जाता है। और फिर दौर शुरू होती है यूरोपीय कम्पनियों की भारत आने की।

इसके पीछे एक इतिहास है जिसे हमलोग जानते है। घटना है 1453 इस्वी का यूरोप का पूर्वी भाग वह पर एक जगह है कस्तुतुनिया, तुर्की के क्षेत्र में अरबो का आक्रमण होता है और अरबों द्वारा वह पर अधिकार जामा लिया ज़ाता है। जिसके कारण ही भारत और यूरोप के बिच का स्थल मार्ग से व्यापार अवरुद्ध हो जाता है। इसतरह से  भौगोलिक खोजों के अंतर्गत व्यापार को खोजने के लिए दूसरे जगहों कि खोज कि शुरुआत होती है। नये नये देशों को खोज स्पेन और पुर्तगाल ने काफी हौसला दिखाया। और इसका नतीजा यह निकलता है। की 1492 में कोलंबस निकलता है भारत की खोज करने लेकिन उसके विपरीत दिशा में जाने से वह अमेरिका का खोज कर लेता है। इसके बाद 1498 में पुर्तगाली वास्कोडिगामा भारत का खोज करता है। इसतरह से सभी यूरोपियों देशों में भारत में आने में होड़ लग जाता है। इसी को हम लोग यूरोपियों कम्पनियों का भारत में आगमन के रूप में पढ़ते है।

कम्पनियों के आगमन का क्रम

यूरोपीय कंपनियों का आगमन | पुर्तगालियों का भारत में आगमन

यूरोपीय कंपनियों का आगमन | पुर्तगालियों का भारत में आगमन

चुकी हम जानते है कि हमारे देश भारत बहुत सरी कम्पनियों का आगमन हुआ। इन्हीं सभी कम्पनियों के आगमन के क्रम को हमलोग पढ़ेंगे।

पुर्तगाली (1498)
यह हम पहले से जानते है कि सबसे पहले भारत में पुर्तगाल से वास्कोडिगामा भारत आया। जो कि भारत के केरला में स्थित कालीकट बंदरगाह पर पहुचां। और उस समय केरला के राजा थे बाबेरियन, जिन्होंने वास्कोडिगामा का भभ्य स्वागत किया।

डच (1595)
पुर्तगालियों के आने के बाद 1595 में डच भारत आया।

अंग्रेज (1600)
इसके बाद तीसरे नंबर पर 1600 ईसवी अंग्रेज भारत आया।

फ़्रेंच(1664)
इसके बाद सबसे अंतिम में 1664 ईसवी में फ़्रेंच भारत आता है।

भारत में व्यापार करने से सभी कम्पनियों का काफी फायदा होने लगा। इसी कारण से सभी विदेशी कम्पनियों का भारत में व्यापार करने में काफी रुचि होने लगा।

भारत में विदेशी कम्पनियों का स्थापना

जितने भी विदेशी व्यापारी भारत आए उनको यहां टिकने के लिए एक कंपनी की आवश्यकता पड़ी।

पुर्तगाली इस्ट इंडिया कंपनी(1498)
पुर्तगालियों ने पहली बार 1498 में अपनी पहली कम्पनी स्थापित की।

अंग्रेज इस्ट इंडिया कंपनी (1600)
अंग्रेजो ने पहली बार 1600 में अपनी पहली कम्पनी स्थापित की।

डच इस्ट इंडिया कंपनी (1602)
डच ने पहली बार 1602 में अपनी पहली कम्पनी स्थापित की।

फ्रांसीसी इस्ट इंडिया कंपनी (1664)
फ्रांसीसियों ने पहली बार 1664 में अपनी पहली कम्पनी स्थापित की।

कम्पनियों द्वारा कोठी की स्थापना
चुकी व्यापार को बड़े स्थानों से लेकर छोटे स्थानों तक भी फैलाना था। इसीलिए सभी कम्पनियों ने अपनी अपनी कोठी स्थापित की।

सबसे पहले पुर्तगालियों ने 1503 ईसवी में अपनी पहली कोठी कोचीन में स्थापित की। इसके बाद डच ने 1605 ईसवी पसुलीपत्तम में अपनी पहले कोठी स्थापित की। 1608 ईसवी में पहली बार अंग्रेजो ने सूरत में अपनी पहली कोठी बनाई। और इसके बाद फ्रांसीसी ने 1664 ईसवी में सूरत में अपनी पहली कोठी बनाई।

अब थोड़ा विस्तार में पढ़ते है।

पुर्तगाली

अफ्रीका से होते हुए सबसे पहले पुर्तगाली व्यापारी ही प्रिंस हेनरी के नेतृत्व मर भारत आये थे। प्रिंस हेनरी को थे नेविगेटर के नाम से जाना जाता है क्युकी ये सभी खोजें इन्ही के नेतृत्व मर हो रहा था। और हमलोगों ने पहले पढ़ चुके है की सबसे पहले वास्कोडिगामा पहले पुर्तगाली थे जो भारत के कालीकट बंदरगाह पर आये थे।और वों जिस मार्ग से भारत आये उस मार्ग को केप ऑफ गुड होप के नाम से जाना जाता है। इसके बाद वे यहाँ पर कुछ दिन रहते है और फिर यह्हन से कुछ कपड़े तथा कुछ खाने पिने की वस्तुयें लेकर फिर वापस यूरोप लौट जाते है। और यह मन जाता है की जब वो यूरोप लौट कर उस सामान को बेचा तो उन्हें लगभग मूल क्रय के 60 गुना अधिक फायदा हुआ। और यह जो मुनाफा हुआ था वो काफी अधिक था इसलिए पुर्तगाल के और व्यापारी भारत आने लगे। वास्कोडिगामा  के बाद 1500 इस्वी में  150 व्यापारियों का एक समूह पुर्तगाल से भारत आया। जो की पेड्रो अल्बरेज़ के नेतृत्व मर भारत आया था। फिर ये लोग भीं यहाँ से बहुत सारे सामान लेकर अपने देश चले जाते है। और इनको काफी अधिक फायदा होता है। जिसका परिणाम यह होता है की 1502 इस्वी में वास्कोडिगामा फिर से भारत आता है। और ये जो मुनाफा इन लोगो ने कमाया था इसका परिणामस्वरूप यह हुआ की पुर्तगाली राजाओं  ने कंपनी को बढ़ावा देने के लिए वायसराय भारत भेजने लगा। जिसका कारण यह हुआ की पुर्तगली धीरे धीरे गोवा, दीव, दमन आदि के इलाको में फ़ैल गया।

पुर्तगाली वायसराय का भारत में आगमन

  • फ़्रांसिसी दा अल्मीडा :- भारत में पहला वायसराय फ़्रांसिसी दा अल्मीडा पुर्तगाल से भारत आता है। और भारत में इनका समय अवधि 1505 इस्वी से लेकर 1509 इस्वी तक होता है। अल्मीडा पुर्तगालियों द्वारा भेजा गया पहला वायसराय था। इसीलिए लिए इन्हें भारत में प्रथम पुर्तगाली वायसराय (गवर्नर) कहा जाता है। और इन्ही के नेतृत्व में भारत में सबसे पहले कंपनी का कार्य प्रारंभ होता है। इन्होने भारत में एक अलग निति चलाया जिसका नाम था ब्लू वाटर पॉलिसी। और इस ब्लू वाटर  पॉलिसी के तहत हिन्द महासागर के जितने भी मर्गिये इलाका था उस पर पुर्तगाली सिर्फ अपने जहाजों का अधिकार जमाना चाहता था। और सभी व्यापारों को अंपने अधीन करना चाहता था। जिसका परिणामस्वरूप यह होता है की हिन्द महासागर में पुर्तगालियों का वर्चस्व हो जाता है। जिसे बाद में डच एवं अन्य दुसरें व्यापारी तोड़तें है।
  • अलबुकर्क :- अलबुकर्क पुर्तगालियों द्वारा भारत में भेजा गया दूसरा वायसराय था। ये 1509 में भारत में आते है और 1515 तक भारत में रुकतें है। अलबुकर्क को भारत में पुर्तगालियों का असली संस्थापक माना जाता है। इन्होनें अपनी राजधानी कोचीन में बनाई। इसके बाद इन्होनें 1510 इस्वी में बीजापुर के शासक आदिलशाह को हराकर गोवा पर कब्ज़ा कर लिया। जहां पर अल्मीडा ने ब्लू वाटर पॉलिसी चलाई यहाँ पर अलबुकर्क के विवाह निति चलाया। इसके तहत जितने भी पुर्तगाली व्यापारी थे उस सबका विवाह भारत के लड़कियों से कराने लगा। जिससे होता यें था की भारतीय लोग उन्हें अपना मान लेते थे।जिसका परिणाम यह होता था की पुर्तगाली लोग अपने सांस्कृतिक व्यहारों को भारत में फ़ैलाने में सफल हो रहे थे। जिससे पुर्तगालियों की स्तिथि और मजबूत होती चली गयी। इस अभियान के समय 3G शब्द का बहुत प्रयोग किया गया था। यहाँ पर 3G का मतलब 3G सिम नहीं है यहाँ पर 3G का मतलब GOD, GOLD, और GLORY है। यहाँ पर GOD का मतलब यह है की वेलोग भारत में इसाई धर्म का प्रचार करना चाहते थे। GOLD का मतलब अपनी व्यापार में बहुत अधिक मुनाफा कमाना चाहते थे। और GLORY का मतलब यह है की पुर्तगाली पुरे विश्व में अपने आप को सर्वौच दिखाना चाहते थे।
  • नीनो डी कुन्हा :- नीनो डी कुन्हा पुर्तगालियों द्वारा भरत में भेजा गया तीसरा वायसराय था। जिस गोवा को अलबुकर्क ने जीता था उसी की इन्होनें अपना राजधानी या कार्यालय क्षेत्र बनाया। गोवा को इन्होनें तो पहले ही जीत चूका था साथ ही साथ इन्होनें दिव को 1535 इस्वी तथा दमन को 1559 इस्वी में जीत लिया।और आपको बता दे की गोवा और उसके आस पास के इलाकों जैसे दमन, दिव जैसे क्षेत्रों में आजादी के बाद भी 1961 इस्वी तक पुर्तगालियों का शासन था।

भारत में प्रिंटिंग प्रेस का जनक पुर्तगालियों को ही माना जाता हैं। तथा कुछ ऐसे भी फल एवं आनाज था जिसे पुर्तगाली अपने साथ भारत लाया था, जो भारत में पहले उगाया नहीं जाता था। जैसे गन्ना, पपीता, अनानास आदि। और इसके बाद इन सबकी खेती भी भारत में होने लगती है।

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